Ambient waves of poem

Ambient waves of poem
Ambient waves of poem

About Me

My photo
join me and i'll better be intoduced through my writings!

Thursday, 29 December 2011

प्रियवंद बनो

प्रियवंद बनो  

वीर देश क योग्य निवासी प्रियवंद बनो ,
हे ईश्वर की श्रेष्ट कृति प्रियवंद बनो |
काला-काला अन्त्य काग है किसके मन को भाता ?
काली पिक सा मृदुभाषी ही सबको सखा बनाता |
प्रथम सोचकर अंत बोलना म्रिदुवचन का सार,
मधुर वचन है नहीं स्वयंभू जो जन्मे अपने आप | 

म्रिदुवचन रिपु मित्र बनाता,  
कुत्रिम विष सोम बन जाता |
तारक तमसा के केश बने त्यों
ललित सुमन की महक बनो
घोर तिमिर में प्रभा बनो
वीर देश क योग्य निवासी प्रियवंद बनो |

प्रियवंद ही है शारदा की सची संतान
कतुभाशी ईर्ष्यालु और आत्मश्लाघी नहीं देश की मान
कटुवचन, मद, क्रोध के रोग को इस औषध से दूर करो
वीर देश के योग्य निवासी प्रियवंद बनो |

प्रियवंद होना ही है चतुर्वेद का सार
प्रेम ही ब्रहमांड का शाश्वत आधार
कोई शिक्षक नहीं पारंगत जब तक वह प्रियवंद न हो
हरे भरे उपवन में ज्यो एकमात्र भी पुष्प न हो
कटुवचन के तीर चलाकर न दूजे को घात करो
हे वीर देश क योग्य निवासी प्रियवंद बनो|

Sunday, 4 December 2011

poem of the poem

I was framed from
The deep soul of my creator 
And from the deep core of an endless ocean in his heart
For the possession to enlighten
The steady sleeping world
And to apprise and awake it for its rejuvenation.

I was made glamorous,accurate and apt by care
With Horde of words accrued
To echo into the world
Now it was the time when 
The bond of physical contact was detached
And he sent me as a father 
with the feeling both sweet and sour.

I gazed and relocated as harbinger
For fruition of my father
And tried to alter the minds 
Through my truncheon  "The text".

The literature witness for my transition 
And the world for being genial
From centuries,I've been proverbial
For my infinite forms
And I loose my existence
For service of humanity
I have always left my impalpable nature 
To change into nature,love and your life.